प्रस्तावना

प्रस्तावना-ः

वर्तमान में भारत सरकार वर्ष में लगभग 40000 मी०टन सिल्क की खपत के सापेक्ष लगभग 30000 मी०टन का उत्पादन किया जाता है। उत्तर प्रदेश की कुल खपत लगभग 3000 मी० टन है जिसके सापेक्ष प्रदेश का उत्पादन लगभग 400 मी०टन है।
शेष कोया / धागा प्रदेश व देश के बाहर से आयात किया जाता है। उपरोक्त मांग-उत्पादन के अन्तर को कम किये जाने और शहतूती कोया उत्पादन को अगले 10 वर्षों में दोगुने से अधिक किये जाने के उद्देश्य से नवीन मुख्यमंत्री रेशम विकास योजना प्रस्तावित की जा रही है।

कोया / रेशम उत्पादन कार्य कृषकों/कीटपालकों / उद्यमियों द्वारा किया जाता है। रेशम विकास विभाग द्वारा मात्र कीटाण्ड उत्पादन व चाकी कार्य (अण्डो से शिशु अवस्था तक पालन का कार्य) किया जाता है और इन्हें कीटपालको को न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता है। लाभार्थियों द्वारा इन शिशुओं को कीटपालन गृह का उपयोग कर कोया उत्पादन किया जाता है।

उल्लेखनीय है कि निजी क्षेत्र के लाभार्थियों का चयन केन्द्र सरकार द्वारा केन्द्रीय रेशम बोर्ड के माध्यम से दिये गये लक्ष्य एवं धनराशि के अनुरूप किया जाता है जिसमें राज्य सरकार की 25 प्रतिशत शेयरिंग रहती है।

केन्द्रीय रेशम बोर्ड द्वारा प्रति वर्ष लगभग 250 एकड़ वृक्षारोपण तथा 400 लाभार्थियों हेतु लक्ष्य एवं धनराशि उपलब्ध करायी जाती है जिससे लगभग 12-13 मी0टन प्रति वर्ष रेशम की वृद्धि होती है, जो 05 प्रतिशत प्रतिवर्ष के लगभग है। उक्त प्रगति अत्यन्त न्यून है और अगले 10 वर्षों में मात्र 130 मी०टन ही उत्पादन में बढोत्तरी हो सकेगी।

रेशम उत्पादन में उक्त बढोत्तरी के अतिरिक्त अगले 10 वर्षों में लगभग 360 मी०टन प्रति वर्ष रेशम उत्पादन किये जाने हेतु राज्य सरकार की शत-प्रतिशत लाभार्थीपरक योजना का होना नितान्त आवश्यक है।